Uttarkashi उत्तराखंड का ज़िला एक बार फिर कुदरत के कहर का गवाह बना। धराली गांव, जहां लोगों की सुबह आम दिनों की तरह शुरू हुई थी, अचानक खौफ और तबाही में तब्दील हो गई। ऊंचाई वाले इलाके में बादल फटने से खीरगंगा नदी उफान पर आ गई और बाढ़ ने देखते ही देखते पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लिया। इस हृदय विदारक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है।

Uttarkashi में बादल फटने की भयावहता
घटना शनिवार रात की है, जब उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में अचानक आसमान फटा और देखते ही देखते गांव सैलाब में डूब गया। आधिकारिक रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक 4 लोगों की मौत हो चुकी है और 70 से ज्यादा लोग लापता हैं। बारिश इतनी तीव्र थी कि खीरगंगा नदी अपने सभी किनारों को पार करते हुए रिहायशी इलाकों में घुस गई। भारी पानी के साथ आया मलबा घरों, दुकानों और खेतों को बहा ले गया।
राहत-बचाव कार्य में जुटी टीमें
आज सुबह से ही NDRF, SDRF, और स्थानीय प्रशासन की टीमें राहत-बचाव कार्य में जुट गई हैं। लापता लोगों की तलाश की जा रही है और हेलिकॉप्टर की मदद से ऊंचाई वाले इलाकों में भी सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है। सेना के जवानों ने भी मोर्चा संभाल लिया है और स्थानीय लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा रहा है।
Uttarkashi के लोग सदमे में
धराली गांव में मातम पसरा हुआ है। जिन परिवारों ने अपने घर और अपने लोगों को खोया है, उनके आंसू थम नहीं रहे। कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने पहले कभी इतना तेज़ और खतरनाक सैलाब नहीं देखा। गांव की गलियों में अब सिर्फ मलबा, टूटी हुई दीवारें और बहा हुआ सामान नजर आ रहा है।
पीएम मोदी ने मुख्यमंत्री से ली जानकारी
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस त्रासदी पर दुख जताया है और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से फोन पर स्थिति की जानकारी ली है। केंद्र सरकार ने हर संभव मदद का आश्वासन दिया है और हालात पर नजर रखी जा रही है। मुख्यमंत्री ने भी पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना प्रकट की है और राहत कार्यों की निगरानी कर रहे हैं।

उत्तरकाशी की भौगोलिक स्थिति और खतरे
Uttarkashi हिमालयी क्षेत्र में बसा एक संवेदनशील इलाका है, जहां भूस्खलन, बाढ़ और बादल फटने की घटनाएं आम हैं। बीते कुछ वर्षों में यहां प्राकृतिक आपदाओं की संख्या में इज़ाफा हुआ है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित निर्माण कार्य इन घटनाओं को बढ़ावा दे रहे हैं।
वैज्ञानिकों की चेतावनी: यह शुरुआत भर है?
जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और भी बढ़ सकती हैं। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में वनों की कटाई, सड़क निर्माण और ग्लेशियरों के पिघलने से वातावरण में असंतुलन बढ़ रहा है। Uttarkashi की घटना को एक चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है कि प्रकृति से खिलवाड़ का अंजाम कितना भयानक हो सकता है।
स्थानीय लोगों की ज़ुबानी
एक स्थानीय निवासी ने बताया, “हम सो रहे थे, अचानक तेज़ आवाज़ आई। बाहर निकले तो पानी ही पानी था। हमारे दो पड़ोसी अब तक नहीं मिले हैं। हमें समझ नहीं आ रहा क्या करें।”
एक और महिला ने कहा, “हमने सब कुछ खो दिया, घर, सामान, और शायद अपने लोग भी। सरकार हमारी मदद करे यही हमारी प्रार्थना है।”
पुनर्वास की जरूरत
उत्तरकाशी के कई गांव अब रहने लायक नहीं बचे हैं। लोगों को अस्थायी शिविरों में रखा गया है लेकिन वहां सुविधाओं की भारी कमी है। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। सरकार को चाहिए कि वह न सिर्फ राहत कार्यों में तेजी लाए, बल्कि दीर्घकालिक पुनर्वास योजना भी तैयार करे।
निष्कर्ष: Uttarkashi की चेतावनी को नज़रअंदाज़ न करें
Uttarkashi की इस भयावह घटना ने हमें फिर से याद दिला दिया है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना कितना जरूरी है। यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं थी, यह एक संदेश था – कि अगर अब भी हम नहीं चेते, तो अगला नंबर किसी और शहर या गांव का हो सकता है।
इसलिए ज़रूरत है जागरूकता की, योजना की और पर्यावरण-संवेदनशील विकास की। ताकि Uttarkashi जैसी घटनाएं फिर दोहराई न जाएं।